कल्पना कीजिए कि आपके हाथ में एक पार्सल है। उस पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा है: "सावधानी से संभालें" (Handle with Care)। हम सभी जानते हैं इसका क्या मतलब है—यह 'नाज़ुक' (Fragile) है। अगर यह गिरेगा, तो टूट जाएगा।
अब, इसका उल्टा सोचिए।
ज्यादातर लोग कहेंगे कि 'नाज़ुक' का उल्टा 'मज़बूत' (Robust) या 'लचीला' (Resilient) होता है। एक ऐसी चीज़ जो गिरने पर टूटे नहीं, जो जैसी है वैसी ही बनी रहे। जैसे कि फीनिक्स पक्षी, जो राख से बार-बार ज़िंदा हो जाता है। लेकिन नसीम निकोलस तालेब (Nassim Nicholas Taleb) हमें रोकते हैं और कहते हैं—"नहीं, आप गलत हैं।"
क्या आपने कभी रुककर सोचा है कि हम सब असल में कर क्या रहे हैं? सुबह उठना, नौकरी पर भागना, पदोन्नति (promotion) के लिए लड़ना, पड़ोसी से बेहतर गाड़ी खरीदना, और अंत में एक दिन मर जाना। ऐसा लगता है जैसे हम सब एक दौड़ का हिस्सा हैं, एक ऐसे खेल का हिस्सा जहाँ हमें किसी को हराना है। लेकिन हराना किसे है? और इस जीत का इनाम क्या है?
क्या आपने कभी आधी रात को छत को घूरते हुए, अचानक एक ठंडी सिहरन महसूस की है? वह पल जब आपके दिमाग के किसी कोने में दबी हुई सच्चाई चीख कर बाहर आती है: "मैं एक दिन नहीं रहूंगा। मेरा वजूद मिट जाएगा।"
हममें से अधिकांश लोग इस विचार को तुरंत झटक देते हैं। हम अपना फोन उठाते हैं, इंस्टाग्राम स्क्रॉल करते हैं, ऑफिस की प्रेजेंटेशन के बारे में सोचते हैं, या किसी नए 'पैशन' की तलाश में लग जाते हैं। हम खुद को व्यस्त रखते हैं। लेकिन अर्नेस्ट बेकर (Ernest Becker) अपनी पुलित्ज़र पुरस्कार विजेता कृति "The Denial of Death" (मृत्यु का अस्वीकार) में तर्क देते हैं कि यह व्यस्तता महज संयोग नहीं है। यह हमारी पूरी सभ्यता का आधार है।
बेकर का कहना है कि मानव सभ्यता—हमारे गगनचुंबी इमारतें, हमारे युद्ध, हमारे प्रेम संबंध, हमारी कला और यहाँ तक कि हमारा बैंक बैलेंस—सब कुछ एक ही चीज़ के खिलाफ खड़ा किया गया एक विशाल किला है: मृत्यु का भय।
यह किताब कोई हल्की-फुल्की सेल्फ-हेल्प गाइड नहीं है। यह एक हथौड़ा है जो आपके अहंकार (Ego) के कांच को चकनाचूर कर देता है। यदि आप उस सच्चाई का सामना करने का साहस रखते हैं जो फ्रायड (Freud) और कीर्केगार्ड (Kierkegaard) जैसे दिग्गजों ने भी दबी जुबान में कही थी, तो बेकर आपको एक ऐसी यात्रा पर ले जाने के लिए तैयार हैं जहाँ से वापस लौटना नामुमकिन है।
इससे पहले कि हम इस गहरे कुएं में छलांग लगाएं, अगर आप मूल पुस्तक को अपने हाथों में लेकर इस अनुभव को जीना चाहते हैं, तो The Denial of Death की अपनी प्रति यहाँ से प्राप्त करें। यह वह निवेश है जो आपको जीवन को (और मृत्यु को) देखने का नया चश्मा देगा।
कल्पना कीजिए कि आप एक पार्टी में हैं। हाथ में ड्रिंक है, और आप किसी ऐसे व्यक्ति से बात कर रहे हैं जो एक बैंकर या वकील है। आप नैतिकता, गरीबी या ग्लोबल इकोनॉमी की बात छेड़ते हैं, और सामने वाला व्यक्ति एक भारी-भरकम सांस लेते हुए कहता है, "देखिए, जो भी हो, अगर किसी ने पैसा उधार लिया है, तो उसे चुकाना ही चाहिए। यह एक नैतिक जिम्मेदारी है।"
हम सभी ने यह सुना है। हमारे दिमाग की गहराइयों में यह बात बिठा दी गई है: "अपना कर्ज चुकाना ही सबसे बड़ा धर्म है।"
कल्पना कीजिए कि आप एक तुर्की (Turkey) हैं। एक पक्षी।
हंसिए मत, बस कल्पना कीजिए। एक दयालु किसान आपको हर सुबह दाना डालता है। हर बीतते दिन के साथ, आपके पास इस बात का "सांख्यिकीय प्रमाण" (Statistical Evidence) बढ़ता जाता है कि यह किसान आपका सबसे अच्छा दोस्त है और मानव जाति आपके कल्याण के लिए समर्पित है। आपके जीवन के 1,000 दिन बीत जाते हैं, और आपका विश्वास अटल हो जाता है। आपका डेटा चार्ट ऊपर की ओर जा रहा है। जीवन सुरक्षित है।
और फिर... थैंक्सगिविंग (Thanksgiving) का दिन आता है।
क्या आपको वह पल याद है जब आपने खुद से वादा किया था? "सोमवार से पक्का जिम जाऊंगा," या "अगले महीने से उस प्रोजेक्ट पर काम शुरू कर दूंगा," या शायद "कल सुबह जल्दी उठकर पढ़ाई करूँगा।" हम सभी उस 'कल' के इंतज़ार में ज़िंदगी का एक बड़ा हिस्सा बिता देते हैं—वह 'कल' जो कैलेंडर में तो आता है, लेकिन हमारी हकीकत में कभी नहीं आता।
यह केवल आपकी कहानी नहीं है; यह एक मानवीय त्रासदी है जिसे हम 'प्रोक्रैस्टिनेशन' (Procrastination) या टालमटोल कहते हैं। हम जानते हैं कि हमें क्या करना है, फिर भी हम उसे नहीं करते। आखिर क्यों? क्या हम आलसी हैं? या क्या हमारे दिमाग की वायरिंग में कोई गड़बड़ी है?