क्या आपने कभी आईने में खुद को देखा है और उस प्रतिबिंब से पूछा है, "क्या मुझमें वह बात है?" हम सभी उस क्षण से गुजरते हैं—वह संशय का क्षण, वह डर कि शायद हम औसत बनकर ही रह जाएंगे। दुनिया शोर से भरी है। हर तरफ सफलता के नए फॉर्मूले बेचे जा रहे हैं। लेकिन कभी-कभी, सबसे गहरा ज्ञान सबसे सरल शब्दों में छिपा होता है।
वर्ष 2003 की बात है। ब्रिटिश साइकिलिंग (British Cycling) का भाग्य हमेशा के लिए बदलने वाला था।
लगातार सौ वर्षों से, ब्रिटिश साइकिलिंग की स्थिति 'औसत' भी नहीं, बल्कि दयनीय थी। 1908 के बाद से उन्होंने ओलंपिक में बमुश्किल कोई स्वर्ण पदक जीता था और 'टूर डी फ्रांस' (Tour de France) जैसी प्रतिष्ठित प्रतियोगिता में तो उनकी जीत का सपना देखना भी बेमानी था। उनकी प्रतिष्ठा इतनी खराब थी कि एक शीर्ष साइकिल निर्माता ने उन्हें अपनी साइकिलें बेचने से मना कर दिया था, क्योंकि उन्हें डर था कि इससे उनके ब्रांड की छवि खराब हो जाएगी।
फिर प्रवेश होता है डेव ब्रेल्सफोर्ड (Dave Brailsford) का।
कल्पना कीजिए कि आपके घर के पिछवाड़े (backyard) में एक ऐसी गुप्त तिजोरी दबी हुई है, जिसमें दुनिया की हर खुशी, बेशुमार दौलत और अटूट सेहत का नक्शा मौजूद है। विडंबना यह है कि आप उस जमीन के ऊपर फटे हाल बैठे हैं, अपनी किस्मत को कोस रहे हैं, और बाहर से मदद की भीख मांग रहे हैं। सुनने में यह एक क्रूर मजाक लगता है, है न? लेकिन डॉ. जोसेफ मर्फी (Joseph Murphy) की कालजयी रचना, "द पावर ऑफ योर सबकॉन्शियस माइंड" (The Power of Your Subconscious Mind), हमें इसी क्रूर मजाक की हकीकत से रूबरू करवाती है।
रॉबर्ट कियोसाकी की कालजयी पुस्तक, "रिच डैड पुअर डैड" (Rich Dad Poor Dad), महज़ एक फाइनेंस की किताब नहीं है; यह एक मानसिक क्रांति है। यह उस पुरानी धारणा को तोड़ती है कि अमीर बनने के लिए आपको बहुत अधिक आय की आवश्यकता होती है। यह पुस्तक उस झूठ को बेनकाब करती है जो हमें बचपन से सिखाया जाता है: "अच्छे से पढ़ाई करो ताकि तुम्हें एक सुरक्षित नौकरी मिल सके।"